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महाभारत 1.76.30
शुक्र उवाच · śukra uvāca
वृतोऽनया पतिर्वीर सुतया त्वं ममेष्टयागृहाणेमां मया दत्तां महिषीं नहुषात्मज
vṛto'nayā patirvīra sutayā tvaṃ mameṣṭayāgṛhāṇemāṃ mayā dattāṃ mahiṣīṃ nahuṣātmaja
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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