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महाभारत 1.76.32
शुक्र उवाच · śukra uvāca
अधर्मात्त्वां विमुञ्चामि वरयस्व यथेप्षितम्अस्मिन्विवाहे मा ग्लासीरहं पापं नुदामि ते
adharmāttvāṃ vimuñcāmi varayasva yathepṣitamasminvivāhe mā glāsīrahaṃ pāpaṃ nudāmi te
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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