महाभारत 1.77.2
देवयान्याश्चानुमते तां सुतां वृषपर्वणःअशोकवनिकाभ्याशे गृहं कृत्वा न्यवेशयत्
devayānyāścānumate tāṃ sutāṃ vṛṣaparvaṇaḥaśokavanikābhyāśe gṛhaṃ kṛtvā nyaveśayat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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