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महाभारत 1.8.22
तां ते कन्यां व्यसुं दृष्ट्वा भुजगस्य विषार्दिताम्रुरुदुः कृपयाविष्टा रुरुस्त्वार्तो बहिर्ययौ
tāṃ te kanyāṃ vyasuṃ dṛṣṭvā bhujagasya viṣārditāmruruduḥ kṛpayāviṣṭā rurustvārto bahiryayau
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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