महाभारत 1.80.3
देवानतर्पयद्यज्ञैः श्राद्धैस्तद्वत्पितॄनपिदीनाननुग्रहैरिष्टैः कामैश्च द्विजसत्तमान्
devānatarpayadyajñaiḥ śrāddhaistadvatpitṝnapidīnānanugrahairiṣṭaiḥ kāmaiśca dvijasattamān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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