महाभारत 1.80.5
धर्मेण च प्रजाः सर्वा यथावदनुरञ्जयन्ययातिः पालयामास साक्षादिन्द्र इवापरः
dharmeṇa ca prajāḥ sarvā yathāvadanurañjayanyayātiḥ pālayāmāsa sākṣādindra ivāparaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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