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महाभारत 1.80.7
स संप्राप्य शुभान्कामांस्तृप्तः खिन्नश्च पार्थिवःकालं वर्षसहस्रान्तं सस्मार मनुजाधिपः
sa saṃprāpya śubhānkāmāṃstṛptaḥ khinnaśca pārthivaḥkālaṃ varṣasahasrāntaṃ sasmāra manujādhipaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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