Loading
महाभारत 1.83.2
ययातिरुवाचनाहं देवमनुष्येषु न गन्धर्वमहर्षिषुआत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित्पश्यामि वासव
yayātiruvācanāhaṃ devamanuṣyeṣu na gandharvamaharṣiṣuātmanastapasā tulyaṃ kaṃcitpaśyāmi vāsava
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें