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महाभारत 1.85.18
ययातिरुवाचहित्वा सोऽसून्सुप्तवन्निष्टनित्वा; पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं चअन्यां योनिं पवनाग्रानुसारी; हित्वा देहं भजते राजसिंह
yayātiruvācahitvā so'sūnsuptavanniṣṭanitvā; purodhāya sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ caanyāṃ yoniṃ pavanāgrānusārī; hitvā dehaṃ bhajate rājasiṃha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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