महाभारत 1.86.17
आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगयते मुनिःअथास्य लोकः पूर्वो यः सोऽमृतत्वाय कल्पते
āsyena tu yadāhāraṃ govanmṛgayate muniḥathāsya lokaḥ pūrvo yaḥ so'mṛtatvāya kalpate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें