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महाभारत 1.86.8
अष्टक उवाच · aṣṭaka uvāca
कति स्विदेव मुनयो मौनानि कति चाप्युतभवन्तीति तदाचक्ष्व श्रोतुमिच्छामहे वयम्
kati svideva munayo maunāni kati cāpyutabhavantīti tadācakṣva śrotumicchāmahe vayam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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