महाभारत 1.93.45
शंतनुश्चापि शोकार्तो जगाम स्वपुरं ततःतस्याहं कीर्तयिष्यामि शंतनोरमितान्गुणान्
śaṃtanuścāpi śokārto jagāma svapuraṃ tataḥtasyāhaṃ kīrtayiṣyāmi śaṃtanoramitānguṇān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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