महाभारत 1.96.57
ताभ्यां सह समाः सप्त विहरन्पृथिवीपतिःविचित्रवीर्यस्तरुणो यक्ष्माणं समपद्यत
tābhyāṃ saha samāḥ sapta viharanpṛthivīpatiḥvicitravīryastaruṇo yakṣmāṇaṃ samapadyata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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