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महाभारत 1.99.38
भ्रातुः पुत्रान्प्रदास्यामि मित्रावरुणयोः समान्व्रतं चरेतां ते देव्यौ निर्दिष्टमिह यन्मया
bhrātuḥ putrānpradāsyāmi mitrāvaruṇayoḥ samānvrataṃ caretāṃ te devyau nirdiṣṭamiha yanmayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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