महाभारत 10.11.8
ततस्तां पतितां दृष्ट्वा संरम्भी सत्यविक्रमःबाहुभ्यां परिजग्राह समुपेत्य वृकोदरः
tatastāṃ patitāṃ dṛṣṭvā saṃrambhī satyavikramaḥbāhubhyāṃ parijagrāha samupetya vṛkodaraḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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