महाभारत 10.17.13
सोऽब्रवीत्पितरं दृष्ट्वा गिरिशं मग्नमम्भसियदि मे नाग्रजस्त्वन्यस्ततः स्रक्ष्याम्यहं प्रजाः
so'bravītpitaraṃ dṛṣṭvā giriśaṃ magnamambhasiyadi me nāgrajastvanyastataḥ srakṣyāmyahaṃ prajāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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