महाभारत 10.2.20
दैवतेभ्यो नमस्कृत्य यस्त्वर्थान्सम्यगीहतेदक्षो दाक्षिण्यसंपन्नो न स मोघं विहन्यते
daivatebhyo namaskṛtya yastvarthānsamyagīhatedakṣo dākṣiṇyasaṃpanno na sa moghaṃ vihanyate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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