महाभारत 10.3.2
दह्यमानस्तु शोकेन प्रदीप्तेनाग्निना यथाक्रूरं मनस्ततः कृत्वा तावुभौ प्रत्यभाषत
dahyamānastu śokena pradīptenāgninā yathākrūraṃ manastataḥ kṛtvā tāvubhau pratyabhāṣata
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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