महाभारत 10.6.27
प्रतिघातं ह्यविज्ञातं प्रवदन्ति मनीषिणःयदारभ्य क्रियां कांचिद्भयादिह निवर्तते
pratighātaṃ hyavijñātaṃ pravadanti manīṣiṇaḥyadārabhya kriyāṃ kāṃcidbhayādiha nivartate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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