महाभारत 10.7.3
शितिकण्ठमजं शक्रं क्रथं क्रतुहरं हरम्विश्वरूपं विरूपाक्षं बहुरूपमुमापतिम्
śitikaṇṭhamajaṃ śakraṃ krathaṃ kratuharaṃ haramviśvarūpaṃ virūpākṣaṃ bahurūpamumāpatim
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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