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महाभारत 10.7.42
मनोवाक्कर्मभिर्भक्तैर्नित्यमाराधितश्च यैःमनोवाक्कर्मभिर्भक्तान्पाति पुत्रानिवौरसान्
manovākkarmabhirbhaktairnityamārādhitaśca yaiḥmanovākkarmabhirbhaktānpāti putrānivaurasān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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