महाभारत 10.7.44
श्रुतेन ब्रह्मचर्येण तपसा च दमेन चये समाराध्य शूलाङ्कं भवसायुज्यमागताः
śrutena brahmacaryeṇa tapasā ca damena caye samārādhya śūlāṅkaṃ bhavasāyujyamāgatāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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