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महाभारत 10.7.58
इत्युक्त्वा द्रौणिरास्थाय तां वेदीं दीप्तपावकाम्संत्यक्तात्मा समारुह्य कृष्णवर्त्मन्युपाविशत्
ityuktvā drauṇirāsthāya tāṃ vedīṃ dīptapāvakāmsaṃtyaktātmā samāruhya kṛṣṇavartmanyupāviśat
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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