महाभारत 10.7.7
शुक्रं विश्वसृजं ब्रह्म ब्रह्मचारिणमेव चव्रतवन्तं तपोनित्यमनन्तं तपतां गतिम्
śukraṃ viśvasṛjaṃ brahma brahmacāriṇameva cavratavantaṃ taponityamanantaṃ tapatāṃ gatim
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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