महाभारत 10.8.100
तांस्तु निष्पततस्त्रस्ताञ्शिबिराञ्जीवितैषिणःकृतवर्मा कृपश्चैव द्वारदेशे निजघ्नतुः
tāṃstu niṣpatatastrastāñśibirāñjīvitaiṣiṇaḥkṛtavarmā kṛpaścaiva dvāradeśe nijaghnatuḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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