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महाभारत 10.8.42
ये त्वजाग्रत कौरव्य तेऽपि शब्देन मोहिताःनिरीक्ष्यमाणा अन्योन्यं द्रौणिं दृष्ट्वा प्रविव्यथुः
ye tvajāgrata kauravya te'pi śabdena mohitāḥnirīkṣyamāṇā anyonyaṃ drauṇiṃ dṛṣṭvā pravivyathuḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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