महाभारत 11.20.8तस्य क्षतजसंदिग्धं जातरूपपरिष्कृतम्विमुच्य कवचं कृष्ण शरीरमभिवीक्षतेtasya kṣatajasaṃdigdhaṃ jātarūpapariṣkṛtamvimucya kavacaṃ kṛṣṇa śarīramabhivīkṣateइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें