महाभारत 11.23.38
अग्नीनाहृत्य विधिवच्चितां प्रज्वाल्य सर्वशःद्रोणमाधाय गायन्ति त्रीणि सामानि सामगाः
agnīnāhṛtya vidhivaccitāṃ prajvālya sarvaśaḥdroṇamādhāya gāyanti trīṇi sāmāni sāmagāḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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