महाभारत 12.103.35
न मे प्रियं यत्स हतः संप्राहैवं पुरो वचःन चकर्थ च मे वाक्यमुच्यमानः पुनः पुनः
na me priyaṃ yatsa hataḥ saṃprāhaivaṃ puro vacaḥna cakartha ca me vākyamucyamānaḥ punaḥ punaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें