महाभारत 12.117.15
मुनिरुवाचन भयं द्वीपिनः कार्यं मृत्युतस्ते कथंचनएष श्वरूपरहितो द्वीपी भवसि पुत्रक
muniruvācana bhayaṃ dvīpinaḥ kāryaṃ mṛtyutaste kathaṃcanaeṣa śvarūparahito dvīpī bhavasi putraka
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें