महाभारत 12.121.46
सप्तप्रकृति चाष्टाङ्गं शरीरमिह यद्विदुःराज्यस्य दण्ड एवाङ्गं दण्डः प्रभव एव च
saptaprakṛti cāṣṭāṅgaṃ śarīramiha yadviduḥrājyasya daṇḍa evāṅgaṃ daṇḍaḥ prabhava eva ca
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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