महाभारत 12.126.5रेमाते यत्र तौ नित्यं नरनारायणावृषीअदूरादाश्रमं कंचिद्वासार्थमगमं ततःremāte yatra tau nityaṃ naranārāyaṇāvṛṣīadūrādāśramaṃ kaṃcidvāsārthamagamaṃ tataḥइस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।पुस्तक में खोलेंयह श्लोक साझा करें