महाभारत 12.128.2
दुष्टामात्यसहायस्य स्रुतमन्त्रस्य सर्वतःराज्यात्प्रच्यवमानस्य गतिमन्यामपश्यतः
duṣṭāmātyasahāyasya srutamantrasya sarvataḥrājyātpracyavamānasya gatimanyāmapaśyataḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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