महाभारत 12.128.32
कोशं दण्डं बलं मित्रं यदन्यदपि संचितम्न कुर्वीतान्तरं राष्ट्रे राजा परिगते क्षुधा
kośaṃ daṇḍaṃ balaṃ mitraṃ yadanyadapi saṃcitamna kurvītāntaraṃ rāṣṭre rājā parigate kṣudhā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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