महाभारत 12.136.146
सख्यं सोदरयोर्भ्रात्रोर्दंपत्योर्वा परस्परम्कस्यचिन्नाभिजानामि प्रीतिं निष्कारणामिह
sakhyaṃ sodarayorbhrātrordaṃpatyorvā parasparamkasyacinnābhijānāmi prītiṃ niṣkāraṇāmiha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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