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महाभारत 12.136.45
श्रेयान्हि पण्डितः शत्रुर्न च मित्रमपण्डितम्मम ह्यमित्रे मार्जारे जीवितं संप्रतिष्ठितम्
śreyānhi paṇḍitaḥ śatrurna ca mitramapaṇḍitammama hyamitre mārjāre jīvitaṃ saṃpratiṣṭhitam
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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