महाभारत 12.136.7
कथं मित्रमरिं चैव विन्देत भरतर्षभचेष्टितव्यं कथं चात्र शत्रोर्मित्रस्य चान्तरे
kathaṃ mitramariṃ caiva vindeta bharatarṣabhaceṣṭitavyaṃ kathaṃ cātra śatrormitrasya cāntare
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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