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महाभारत 12.136.80
ग्राहयित्वा तु तं स्वार्थं मार्जारं मूषकस्तदाप्रविवेश सुविस्रब्धः सम्यगर्थांश्चचार ह
grāhayitvā tu taṃ svārthaṃ mārjāraṃ mūṣakastadāpraviveśa suvisrabdhaḥ samyagarthāṃścacāra ha
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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