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महाभारत 12.136.96
न ह्येवं मित्रकार्याणि प्रीत्या कुर्वन्ति साधवःयथा त्वं मोक्षितः कृच्छ्रात्त्वरमाणेन वै मया
na hyevaṃ mitrakāryāṇi prītyā kurvanti sādhavaḥyathā tvaṃ mokṣitaḥ kṛcchrāttvaramāṇena vai mayā
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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