महाभारत 12.137.55
अहं हि पुत्रशोकेन कृतपापा तवात्मजेतथा त्वया प्रहर्तव्यं मयि तत्त्वं च मे शृणु
ahaṃ hi putraśokena kṛtapāpā tavātmajetathā tvayā prahartavyaṃ mayi tattvaṃ ca me śṛṇu
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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