महाभारत 12.137.86
गृहं क्षेत्राणि मित्राणि स्वदेश इति चापरेइत्येवमवसीदन्ति नरा बुद्धिविपर्यये
gṛhaṃ kṣetrāṇi mitrāṇi svadeśa iti cāpareityevamavasīdanti narā buddhiviparyaye
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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