महाभारत 12.138.45
अशङ्क्यमपि शङ्केत नित्यं शङ्केत शङ्कितात्भयं हि शङ्किताज्जातं समूलमपि कृन्तति
aśaṅkyamapi śaṅketa nityaṃ śaṅketa śaṅkitātbhayaṃ hi śaṅkitājjātaṃ samūlamapi kṛntati
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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