महाभारत 12.140.2
संमुह्यामि विषीदामि धर्मो मे शिथिलीकृतःउद्यमं नाधिगच्छामि कुतश्चित्परिचिन्तयन्
saṃmuhyāmi viṣīdāmi dharmo me śithilīkṛtaḥudyamaṃ nādhigacchāmi kutaścitparicintayan
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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