महाभारत 12.142.23
उवाच च स्वागतं ते ब्रूहि किं करवाण्यहम्संतापश्च न कर्तव्यः स्वगृहे वर्तते भवान्
uvāca ca svāgataṃ te brūhi kiṃ karavāṇyahamsaṃtāpaśca na kartavyaḥ svagṛhe vartate bhavān
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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