महाभारत 12.142.4
अपि स्वस्ति भवेत्तस्याः प्रियाया मम काननेतया विरहितं हीदं शून्यमद्य गृहं मम
api svasti bhavettasyāḥ priyāyā mama kānanetayā virahitaṃ hīdaṃ śūnyamadya gṛhaṃ mama
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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