महाभारत 12.142.8
भार्या हि परमो नाथः पुरुषस्येह पठ्यतेअसहायस्य लोकेऽस्मिँल्लोकयात्रासहायिनी
bhāryā hi paramo nāthaḥ puruṣasyeha paṭhyateasahāyasya loke'smim̐llokayātrāsahāyinī
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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