महाभारत 12.151.32
अक्षौहिण्यो दशैका च सप्त चैव महाद्युतेबलेन न समा राजन्नर्जुनस्य महात्मनः
akṣauhiṇyo daśaikā ca sapta caiva mahādyutebalena na samā rājannarjunasya mahātmanaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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