महाभारत 12.151.7
नाहं त्वा नाभिजानामि विदितश्चासि मे द्रुमपितामहः प्रजासर्गे त्वयि विश्रान्तवान्प्रभुः
nāhaṃ tvā nābhijānāmi viditaścāsi me drumapitāmahaḥ prajāsarge tvayi viśrāntavānprabhuḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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