महाभारत 12.157.7
लोभात्क्रोधः प्रभवति परदोषैरुदीर्यतेक्षमया तिष्ठते राजञ्श्रीमांश्च विनिवर्तते
lobhātkrodhaḥ prabhavati paradoṣairudīryatekṣamayā tiṣṭhate rājañśrīmāṃśca vinivartate
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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