महाभारत 12.160.55
छिन्दन्भिन्दन्रुजन्कृन्तन्दारयन्प्रमथन्नपिअचरद्दैत्यसंघेषु रुद्रोऽग्निरिव कक्षगः
chindanbhindanrujankṛntandārayanpramathannapiacaraddaityasaṃgheṣu rudro'gniriva kakṣagaḥ
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें